Friday, 7 September 2018

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अधिनियम -1989 क्या है और क्या क्या हुए बदलाव



अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989




अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 1989, को 11 सितम्बर 1989 में भारतीय संसद द्वारा पारित किया था, जिसे 30 जनवरी 1990 से सारे भारत में लागू किया गया। यह अधिनियम उस प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होता हैं जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नही हैं तथा वह व्यक्ति इस वर्ग के सदस्यों का उत्पीड़न करता हैं। इस अधिनियम मे 5 अध्याय एवं 23 धाराएँ हैं।


भारत सरकार ने दलितों पर होने वालें विभिन्न प्रकार के अत्याचारों को रोकनें के लिए भारतीय संविधान की अनुच्छेद 17 के आलोक में यह विधान पारित किया। इस अधिनियम में छुआछूत संबंधी अपराधों के विरूद्ध दण्ड में वृद्धि की गई हैं तथा दलितों पर अत्याचार के विरूद्ध कठोर दंड का प्रावधान किया गया हैं। इस अधिनिमय के अन्तर्गत आने वालें अपराध संज्ञेय गैरजमानती और असुलहनीय होते हैं। यह अधिनियम 30 जनवरी 1990 से भारत में लागू हो गया।

यह अधिनियम उस व्यक्ति पर लागू होता हैं जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं और इस वर्ग के सदस्यों पर अत्याचार का अपराध करता है़। अधिनियम की धारा 3 (1) के अनुसार जो कोई भी यदि वह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं और इस वर्ग के सदस्यों पर निम्नलिखित अत्याचार का अपराध करता है तो कानून वह दण्डनीय अपराध माना जायेगा-

1. अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को जबरन अखाद्य या घृणाजनक (मल मूत्र इत्यादि) पदार्थ खिलाना या पिलाना।
2. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को शारीरिक चोट पहुंचाना या उनके घर के आस-पास या परिवार में उन्हें अपमानित करने या क्षुब्ध करने की नीयत से कूड़ा-करकट, मल या मृत पशु का शव फेंक देना।
3. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के शरीर से बलपूर्वक कपड़ा उतारना या उसे नंगा करके या उसके चेहरें पर पेंट पोत कर सार्वजनिक रूप में घुमाना या इसी प्रकार का कोई ऐसा कार्य करना जो मानव के सम्मान के विरूद्ध हो।
4. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के भूमि पर से गैर कानूनी-ढंग से खेती काट लेना, खेती जोत लेना या उस भूमि पर कब्जा कर लेना।
5. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को गैर कानूनी-ढंग से उनकें भूमि से बेदखल कर देना (कब्जा कर लेना) या उनके अधिकार क्षेत्र की सम्पत्ति के उपभोग में हस्तक्षेप करना।
6. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के सदस्य को भीख मांगनें के लिए मजबूर करना या उन्हें बुंधुआ मजदूर के रूप में रहने को विवश करना या फुसलाना।
7. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के सदस्य को वोट (मतदान) नहीं देने देना या किसी खास उम्मीदवार को मतदान के लियें मजबूर करना।
8. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के विरूद्ध झूठा, परेशान करने की नीयत से इसे पूर्ण अपराधिक या अन्य कानूनी आरोप लगा कर फंसाना या कारवाई करना।
9. किसी लोक सेवक (सरकारी कर्मचारी/ अधिकारी) को कोई झूठा या तुच्छ सूचना अथवा जानकारी देना और उसके विरूद्ध अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को क्षति पहुंचाने या क्षुब्ध करने के लियें ऐसें लोक सेवक उसकी विधि पूर्ण शक्ति का प्रयोग करना।
10. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को जानबूझकर जनता की नजर में जलील कर अपमानित करना, डराना।
11. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी महिला सदस्य को अनादार करना या उन्हें अपमानित करने की नीयत से शील भंग करने के लिए बल का प्रयोग करना।
12. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी महिला का उसके इच्छा के विरूद्ध या बलपूर्वक यौन शोषण करना।
13. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के सदस्यों द्वारा उपयोग में लायें जाने वालें जलाशय या जल स्त्रोतों का गंदा कर देना अथवा अनुपयोगी बना देना।
14. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को किसी सार्वजनिक स्थानों पर जाने से रोकना, रूढ़ीजन्य अधिकारों से वंचित करना या ऐसे स्थान पर जानें से रोकना जहां वह जा सकता हैं।
15. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को अपना मकान अथवा निवास स्थान छोड़नें पर मजबूर करना या करवाना।

ऊपर वर्णित अत्याचार के अपराधों के लियें दोषी व्यक्ति को छः माह से पाँच साल तक की सजा, अर्थदण्ड (फाइन) के साथ प्रावधान हैं। क्रूरतापूर्ण हत्या के अपराध के लिए मृत्युदण्ड की सजा हैं।
अधिनियम की धारा 3 (2) के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं और-

यदि वह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के खिलाफ झूठा गवाही देता है या गढ़ता हैं जिसका आशय किसी ऐसे अपराध में फँसाना हैं जिसकी सजा मृत्युदंड या आजीवन कारावास जुर्मानें सहित है। और इस झूठें गढ़ें हुयें गवाही के कारण अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के सदस्य को फाँसी की सजा दी जाती हैं तो ऐसी झूठी गवाही देने वालें मृत्युदंड के भागी होंगें।
यदि वह मिथ्या साक्ष्य के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को किसी ऐसे अपराध के लियें दोष सिद्ध कराता हैं जिसमें सजा सात वर्ष या उससें अधिक है तो वह जुर्माना सहित सात वर्ष की सजा से दण्डनीय होगा।

आग अथवा किसी विस्फोटक पदार्थ द्वारा किसी ऐसे मकान को नष्ट करता हैं जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य द्वारा साधारणतः पूजा के स्थान के रूप में या मानव आवास के स्थान के रूप में या सम्पत्ति की अभिरक्षा के लिए किसी स्थान के रूप में उपयोग किया जाता हैं, वह आजीवन कारावास के साथ जुर्मानें से दण्डनीय होगा।

लोक सेवक होत हुयें इस धारा के अधीन कोई अपराध करेगा, वह एक वर्ष से लेकर इस अपराध के लिए उपबन्धित दण्ड से दण्डनीय होगा। अधिनियम की धारा 4 (कर्तव्यों की उपेक्षा के दंड) के अनुसार कोई भी सरकारी कर्मचारी/अधिकारी जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं, अगर वह जानबूझ कर इस अधिनियम के पालन करनें में लापरवाही करता हैं तो वह दण्ड का भागी होता। उसे छः माह से एक साल तक की सजा दी जा सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने जारी की SC-ST एक्ट की नई गाइडलाइंस, हुए ये बदलाव

  • अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अधिनियम-1989 के दुरुपयोग पर बंदिश लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एतिहासिक फैसला सुनाया. कोर्ट ने महाराष्ट्र के एक मामले में फैसला सुनाते हुए नई गाइडलाइन जारी की है. इसके तरत एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी नहीं होगी.
  • इसके पहले आरोपों की डीएसपी स्तर का अधिकारी जांच करेगा. यदि आरोप सही पाए जाते हैं तभी आगे की कार्रवाई होगी. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एके गोयल और यूयू ललित की बेंच ने गाइडलाइन जारी करते हुए कहा कि संसद ने यह कानून बनाते समय नहीं यह विचार नहीं आया होगा कि अधिनियम का दुरूपयोग भी हो सकता है. देशभर में ऐसे कई मामले सामने आई जिसमें इस अधिनियम के दुरूपयोग हुआ है.
  • नई गाइडलाइन के तहत सरकारी कर्मचारियों को भी रखा गया है. यदि कोई सरकारी कर्मचारी अधिनियम का दुरूपयोग करता है तो उसकी गिरफ्तारी के लिए विभागीय अधिकारी की अनुमति जरूरी होगी. यदि कोई अधिकारी इस गाइडलाइन का उल्लंघन करता है तो उसे विभागीय कार्रवाई के साथ कोर्ट की अवमानना की कार्रवाई का भी सामना करना होगा.
  • वहीं, आम आदमियों के लिए गिरफ्तारी जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) की लिखित अनुमति के बाद ही होगी.
  • इसके अलावा बेंच ने देश की सभी निचली अदालतों के मजिस्ट्रेट को भी गाइडलाइन अपनाने को कहा है. इसमें एससी/एसटी एक्ट के तहत आरोपी की अग्रिम जमानत पर मजिस्ट्रेट विचार करेंगे और अपने विवेक से जमानत मंजूर और नामंजूर करेंगे.
  • अब तक के एससी/एसटी एक्ट में यह होता था कि यदि कोई जातिसूचक शब्द कहकर गाली-गलौच करता है तो इसमें तुरंत मामला दर्ज कर गिरफ्तारी की जा सकती थी.
  • इन मामलों की जांच अब तक इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अधिकारी ही करते थे, लेकिन अब जांच वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) के तहत होगी.
  • ऐसे मामलों में कोर्ट अग्रिम जमानत नहीं देती थी. नियमित जमानत केवल हाईकोर्ट के द्वारा ही दी जाती थी. लेकिन अब कोर्ट इसमें सुनवाई के बाद ही फैसला लेगा.
  • एनसीआरबी 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में जातिसूचक गाली-गलौच के 11,060 मामलों की शिकायतें सामने आई थी. इनमें से दर्ज हुईं शिकायतों में से 935 झूठी पाई गईं.


लोकसभा ने SC/ST अत्याचार निवारण संशोधन बिल 2018 को पास किया

6 अगस्त 2018 को लोकसभा ने SC और ST(अत्याचार रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2018 पारित किया।विधेयक लोकसभा में सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्री, थवार चंद गेहलोत ने 3 अगस्त 2018 को पेश किया था।

SC / ST कानून के तहत गिरफ्तारी के खिलाफ कुछ सुरक्षा उपायों के संबंध में लोकसभा ने SC और ST (अत्याचार रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2018 को सर्वसम्मति से पारित किया है। विधेयक SC और ST (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 1989 में संशोधन करना चाहता है।

विधेयक के प्रावधान

  • विधेयक में कहा गया है कि जांच अधिकारी को आरोपी की गिरफ्तारी के लिए किसी भी प्राधिकारी की मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी।
  • अधिनियम के तहत आरोपी व्यक्ति के खिलाफ पहली सूचना रिपोर्ट के पंजीकरण के लिए प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं होगी।
  • SC / ST अधिनियम 1 989 में कहा गया है कि अधिनियम के तहत अपराध करने का आरोप लगाया गया व्यक्ति अग्रिम जमानत के लिए आवेदन नहीं कर सकता है। विधेयक यह स्पष्ट करना चाहता है कि यह प्रावधान अन्यथा प्रदान करने वाले न्यायालय के किसी भी निर्णय या आदेश के बावजूद लागू होगा।
  • SC और ST (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 1989
  • इसे लोकप्रिय रूप से अत्याचार रोकथाम (POA) अधिनियम या केवल अत्याचार अधिनियम के रूप में जाना जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य सक्रिय प्रयासों के माध्यम से हाशिए के लिए न्याय प्रदान करना है, जिससे उन्हें गरिमा, आत्म-सम्मान और जीवन के बिना प्रमुख जातियों से डर, हिंसा या दमन का जीवन दिया जाता है। इस अधिनियम में आपराधिक अपराधों को लेकर विभिन्न अनुच्छेदों या व्यवहारों से संबंधित 22 अपराधों को सूचीबद्ध किया गया है और SC / ST समुदाय के आत्म सम्मान और सम्मान को तोड़ दिया गया है। इसमें आर्थिक, लोकतांत्रिक और सामाजिक अधिकारों, भेदभाव, शोषण और कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग से इनकार करना शामिल है।
  • यह अधिनियम सामाजिक विकलांगों से SC/ ST समुदाय को भी सुरक्षा प्रदान करता है जैसे कि कुछ स्थानों तक पहुंच से इनकार करना और परंपरागत मार्ग, व्यक्तिगत अत्याचार जैसे कि सशक्त पेय या अदृश्य भोजन, चोट, यौन शोषण आदि खाने, संपत्तियों को प्रभावित करने वाले अत्याचार, दुर्भावनापूर्ण अभियोजन , राजनीतिक विकलांगता और आर्थिक शोषण। अधिनियम की धारा 14 त्वरित परीक्षण के लिए प्रत्येक जिले में इस अधिनियम के तहत अपराधों का प्रयास करने के लिए सत्र न्यायालय को विशेष न्यायालय प्रदान करता है।

बिल विधेयक की विशेषताएं

  • विधेयक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 1 9 8 9 के मूल प्रावधानों को पुनर्स्थापित करता है। अधिनियम SC और ST के सदस्यों के खिलाफ अपराधों के आयोग को प्रतिबंधित करता है और विशेष अदालतों की स्थापना करता है ऐसे अपराधों और पीड़ितों के पुनर्वास का परीक्षण।
  • यह 20 मार्च, 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उलट देता है, जिसने दलितों और आदिवासियों को अत्याचारों से बचाने वाले कानून के कुछ प्रावधानों को 'पतला' कर दिया।
  • 2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिनियम के तहत अपराध करने के आरोप में व्यक्तियों के लिए गिरफ्तारी से पहले वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की मंजूरी की आवश्यकता होगी। इसके अलावा, उप पुलिस अधीक्षक यह पता लगाने के लिए प्रारंभिक जांच कर सकता है कि अधिनियम के तहत पहला मामला मामला है या नहीं।
  • अदालत ने फैसला सुनाया कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा पूर्व अनुमोदन के बाद SC/ ST अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में एक सरकारी कर्मचारी को गिरफ्तार किया जा सकता है।
  • अदालत ने सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ कड़े SC/ ST अधिनियम के व्यापक दुरुपयोग पर ध्यान दिया।
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